Saturday, 25 June 2016

समर्थ रामदास स्वामी कृत मनाचे श्लोक १२१-१३० हिंदी अनुवाद सहित

महाभक्त प्रल्हाद हा कष्टवीला |
म्हणोनी तयाकारणे सिंह जाला ||
न ये ज्वाळ वीशाळ सन्नीध कोणी |
नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ||१२१||
महाभक्त प्रह्लाद को कष्ट हुआ 
तो भगवान् सिंह बने 
जहर और आग की लपटों से उसे बचाया 
जिन भक्तों का ईश्वर को अभिमान हैं उनकी उपेक्षा कैसी

कृपा भाकिता जाहला वज्रपाणी |
तया कारणे वामनू चक्रपाणी ||
द्विजांकारणे भार्गवू चापपाणी |
नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ||१२२||
जब इंद्र ने कृपा की याचना की 
तो चक्रपाणि स्वयं वामन बने 
ब्राह्मणों के लिए परशुराम बने 
जिन भक्तों का ईश्वर को अभिमान हैं उनकी उपेक्षा कैसी

अहल्येसतीलागी आरण्यपंथे |
कुडावा पुढे देव बंदी तयाते ||
बळे सोडिता घाव घाली निशाणी |
नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ||१२३||
सति अहल्या को अरण्य में मुक्ति प्रदान की 
बंदी देवजनों ने जब रक्षा की गुहार लगायी तो 
देवों की रक्षा की जिसका डंका आज भी बज रहा हैं 
जिन भक्तों का ईश्वर को अभिमान हैं उनकी उपेक्षा कैसी

तये द्रौपदीकारणे लागवेगे |
त्वरे धावतो सर्व सांडूनि मागे ||
कळीलागि जाला असे बौद्ध मौनी |
नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ||१२४||
द्रौपदी की पुकार पर बड़ी ही शीघ्रता से दौड़े 
जैसे ही पुकार सुनी सब दूसरे काम छोड़ दिए 
कलियुग में लोककल्याण के लिए बुद्ध अवतार लिया
जिन भक्तों का ईश्वर को अभिमान हैं उनकी उपेक्षा कैसी

अनाथां दिनांकारणे जन्मताहे |
कलंकी पुढे देव होणार आहे ||
तया वर्णिता शीणली वेदवाणी |
नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ||१२५||
दीन असहाय जनों के लिए ही तो जन्म लेते हैं 
आगे कलकी अवतार धारण करने वाले हैं 
जिसका वर्णन करने में वेद भी असमर्थ हैं 
जिन भक्तों का ईश्वर को अभिमान हैं उनकी उपेक्षा कैसी

जनांकारणे देव लीलावतारी |
बहुतांपरी आदरे वेषधारी ||
तया नेणती ते जन पापरूपी |
दुरात्मे महानष्ट चांडाळ पापी ||१२६||
लोककल्याण के लिए ही भगवान की लीला हैं 
भिन्न भिन्न वेश कितने आदर से धारण करते हैं 
इस बात को न समझने वाले तो पापरूप हैं 
नष्ट दुरात्मा चांडाल और पापी हैं

जगी धन्य तो राममूखे निवाला |
कथा ऐकता सर्व तल्लीन जाला ||
देहेभावना रामबोधे उडाली |
मनोवासना रामरूपी बुडाली ||१२७||
वो धन्य हैं जिसके मुख में हरिनाम हैं 
जिसका सब ध्यान हरिकथा में ही लगा हैं 
राम का बोध होने से जिसकी देह भावना छूट गयी हैं 
जिसके मन की वासनाएँ रामरूप में डूब गयी हैं

मना वासना वासुदेवी वसो दे |
मना वासना कामसंगी नसो दे ||
मना कल्पना वाउगी ते न कीजे |
मना सज्जना सज्जनीं वस्ति कीजे ||१२८||
हमारी वासना तो वासुदेव में हो 
हमारी वासना काम में ना हो 
वाम कल्पनाएं न करे 
हे सज्जन मन सज्जनों के संग रमता जा

गतीकारणे संगती सज्जनाची |
मती पालटे सूमती दुर्जनाची ||
रतीनायिकेचा पती नष्ट आहे |
म्हणोनी मनातीत होवोनी राहे ||१२९||
सत्संग से ही सतगति होगी 
अच्छे विचार एक दुर्जन की दिशा बदल सकते हैं 
मन में तो काम का वास हैं 
इसलिए मन के पार होकर जीना होगा

मना अल्प संकल्प तोही नसावा |
सदा सत्यसंकल्प चित्ती वसावा ||
जनीं जल्प वीकल्प तोही त्यजावा |
रमाकांत एकांतकाळी भजावा ||१३०||
हमारे खुद के कोई संकल्प न हो 
जो सत्य हैं उसके अधीन हमारा चित्त हो 
बकवास न करे जिससे अनेक विकल्प उत्पन्न होते हैं
एकांत में रमाकांत श्रीराम का स्मरण करे










समर्थ रामदास स्वामी कृत मनाचे श्लोक १११-१२० हिंदी अनुवाद सहित

हिताकारणे बोलणे सत्य आहे |
हिताकारणे सर्व शोधूनि पाहे ||
हिताकारणे बंड पाखांड वारी |
तुटे वाद संवाद तो हीतकारी ||१११||
अपना हित चाहते हो तो सत्य पर कायम रहो 
अपने हित के लिए व्यापक अनुसन्धान करो 
परमात्मा को नकारने से हित नहीं होगा 
वाद का अंत करनेवाला संवाद ही हित करेगा

जनीं सांगता ऐकता जन्म गेला |
परी वादवेवाद तैसाचि ठेला ||
उठे संशयो वाद हा दंभधारी |
तुटे वाद संवाद तो हीतकारी ||११२||
कहते सुनते जिंदगी गुजर गयी 
विवाद तो ज्यों के त्यों बना हुआ हैं 
दम्भ ही संशय उत्पन्न करता हैं 
वाद का अंत करनेवाला संवाद ही हित करेगा

जनीं हीत पंडीत सांडीत गेले |
अहंतागुणे ब्रह्मराक्षस जाले ||
तयाहून व्युत्पन्न तो कोण आहे |
मना सर्व जाणीव सांडूनि राहे ||११३||
विद्वानों को दुनिया का भला नहीं करना हैं 
उनको तो अहंकार बढाकर खुदको भस्म करना हैं 
इन विद्वानों से बड़े विद्वान आपको नहीं मिलेंगे 
प्यारे मन तुझे कर्तुत्व का अभिमान छोड़ना होगा

फुकाचे मुखी बोलता काय वेचे |
दिसंदीस अभ्यंतरी गर्व सांचे ||
क्रियेवीण वाचाळता व्यर्थ आहे |
विचारे तुझा तूचि शोधूनि पाहे ||११४||
अपना काम करते रहो रामनाम लेते रहो 
नहीं तो दिनोदिन अहंकार से फूलते जाओगे 
कुछ करोगे भी या सिर्फ बोलते रहोगे 
खुद ढूंढिए और खुद पाइए

तुटे वाद संवाद तेथे करावा |
विवेके अहंभाव हा पालटावा ||
जनीं बोलण्यासारखे आचरावे |
क्रियापालटे भक्तिपंथेचि जावे ||११५||
ऐसा संवाद करे जिससे वाद समाप्त हो 
विवेकी बने अहंकार छोड़े 
जैसा बोलते हो वैसा करे 
खुद को रूपांतरित करे भक्तिपंथ पर बढे

बहू श्रापिता कष्टला अंबऋषी |
तयाचे स्वये श्रीहरी जन्म सोशी ||
दिला क्षीरसिंधु तया ऊपमानी |
नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ||११६||
अम्ब्रीश को श्रापमुक्त करने के लिए 
श्रीहरि खुद जन्म लेते हैं 
वे उपमन्यु को क्षीरसागर प्रदान करते हैं 
वे अपने भक्तों की कभी उपेक्षा नहीं करते हैं

धुरू लेंकरु बापुडे दैन्यवाणे |
कृपा भाकिता दीधली भेटि जेणे ||
चिरंजीव तारांगणी प्रेमखाणी |
नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ||११७
ध्रुव की अवस्था तो बड़ी ही दीन थी
उसने भगवन की कृपा चाही तो दर्शन दिए 
प्रेम का खजाना पाकर तारामंडल में चिरंजीव हुआ 
जिन भक्तों का ईश्वर को अभिमान हैं उनकी उपेक्षा कैसी

गजेंद्रू महासंकटी वाट पाहे |
तयाकारणे श्रीहरी धावताहे ||
उडी घातली जाहला जीवदानी |
नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ||११८||
गजेंद्र की जान पर संकट आया तो प्रभु को पुकारा 
पुकार सुनकर श्रीहरि तुरंत दौड़ पड़े 
तुरंत छलांग लगाकर जीवनदान दिया 
जिन भक्तों का ईश्वर को अभिमान हैं उनकी उपेक्षा कैसी

अजामेळ पापी तया अंत आला |
कृपाळूपणे तो जनीं मुक्त केला ||
अनाथासि आधार हा चक्रपाणी |
नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ||११९||
अजामिल पापी जब मौत के निकट पहुँचा
कृपा करते हुए उसे मुक्त किया 
अनाथों के आधार तो एक श्रीहरि ही हैं 
जिन भक्तों का ईश्वर को अभिमान हैं उनकी उपेक्षा कैसी

विधीकारणे जाहला मत्स्य वेगी |
धरी कूर्मरूपे धरा पृष्ठभागी ||
जना रक्षणाकारणे नीच योनी |
नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ||१२०||
ब्रह्माजी के कहने से बड़ी शीघता से मत्स्य बने 
कछुआ बनकर धरती को पीठ पर धारण किया 
लोककल्याण के लिए कितनी ही हीन योनियों में जन्मे 
जिन भक्तों का ईश्वर को अभिमान हैं उनकी उपेक्षा कैसी










समर्थ रामदास स्वामी कृत मनाचे श्लोक १०१-११० हिंदी अनुवाद सहित

जया नावडे नाम त्या येम जाची |
विकल्पे उठे तर्क त्या नर्क ची ची ||
म्हणोनी अती आदरे नाम घ्यावे |
मुखे बोलता दोष जाती स्वभावे ||१०१||
द्वन्द्वों के ऊपर उठोगे नहीं तो काल का ग्रास बनोगे 
केवल विकल्प और तर्क तो नर्क में ही ले जायेंगे 
इसीलिए कोरे तर्क छोड़कर आदरपुर्वक नामस्मरण करें 
मुंह में नाम रहेगा तो स्वभाव में रहोगे दोषों से दूर

अती लीनता सर्वभावे स्वभावे |
जना सज्जनालागि संतोषवावे ||
देहे कारणी सर्व लावीत जावे |
सगूणी अती आदरेसी भजावे ||१०२||
आपके सब भावों में और स्वभाव में शालीनता हो 
सज्जन लोग आपसे आपके व्यवहार से संतुष्ट हो 
आपके हर सांस का व्यय शुभ कार्यों में हो 
शुभ कार्य करना ही सगुण परमात्मा का भजन हैं

हरीकीर्तनी प्रीति रामी धरावी |
देहेबुद्धि नीरूपणी वीसरावी ||
परद्रव्य आणीक कांता परावी |
यदर्थी मना सांडि जीवी करावी ||१०३||
जब हरि कीर्तन हो तो प्रीती राम में ही हो 
जब भगवतचर्चा करते हैं तो देह भूल जाए 
पर द्रव्य और पर स्त्री से संपर्क तो होगा 
हीनता न करते हुए राम को केंद्र में रखना होगा

क्रियेवीण नानापरी बोलिजेते |
परी चित्त दुश्चित्त ते लाजवीते ||
मना कल्पना धीट सैराट धावे |
तया मानवा देव कैसेनि पावे ||१०४||
हम करते कुछ नहीं बोलते बहोत हैं 
हमारे मन का मैल हमें लज्जित करता हैं 
यदि मन में कल्पनाएं बेलगाम दौड़ रही हैं 
तो परमात्मा से मिलन कैसे भला होगा

विवेके क्रिया आपुली पालटावी |
अती आदरे शुद्ध क्रीया धरावी ||
जनीं बोलण्यासारिखे चाल बापा |
मना कल्पना सोडि संसारतापा ||१०५||
विवेक को जागृत रखते हुए क्रियाशील बने 
बड़े ही भाव से शुभ कर्म में लग जाए 
आप खुद जैसा बोलते हो वैसे करे 
लोगों को प्रभावित करने के लिए डींगे न हाके

बरी स्नानसंध्या करी एकनिष्ठा |
विवेके मना आवरी स्थानभ्रष्टा ||
दया सर्वभूती जया मानवाला |
सदा प्रेमळू भक्तिभावे निवाला ||१०६||
अपने कर्मकांड पूरी निष्ठां से करे 
विवेक जगाए मन को भटकने न दे 
सब प्राणीमात्रों के प्रति जिसके ह्रदय में करुणा हैं 
उसीमे प्रेमभाव बना रहेगा और वो भक्ति रस का अनुभव करेगा

मना कोप आरोपणा ते नसावी |
मना बुद्धि हे साधुसंगी वसावी ||
मना नष्ट चांडाळ तो संग त्यागी |
मना होइ रे मोक्षभागी विभागी ||१०७||
क्रोध के आवेग में ना आये 
बुद्धि का सत्संग बना रहे 
नीच कल्पनाओं से अपने चित्त को ना भरे 
ऐसा करने से आप मुक्ति के अधिकारी होंगे

मना सर्वदा सज्जनाचेनि योगे |
क्रिया पालटे भक्तिभावार्थ लागे ||
क्रियेवीण वाचाळता ते निवारी |
तुटे वाद संवाद तो हीतकारी ||१०८||
हमारा मन हमेशा सत्संग में रहे 
तभी तो क्रिया सुधरेगी भक्तिभाव जागेगा
ऐसा होनेसे सिर्फ बोलेंगे नहीं करेंगे भी 
संवाद से वाद ख़त्म होंगे और हित साध्य होगा

जनीं वादवेवाद सोडूनि द्यावा |
जनीं सूखसंवाद सूखे करावा ||
जगी तोचि तो शोकसंतापहारी |
तुटे वाद संवाद तो हीतकारी ||१०९||
लोगों से वादविवाद ना करे 
लोगों से सुखपूर्वक सुखसंवाद करे 
इसीसे शोकसंताप दूर होगा 
वाद का अंत करनेवाला संवाद ही हित करेगा

तुटे वाद संवाद त्याते म्हणावे |
विवेके अहंभाव याते जिणावे ||
अहंतागुणे वाद नाना विकारी |
तुटे वाद संवाद तो हीतकारी ||११०||
संवाद तो वही हैं जो वाद समाप्त करे 
अपने अहंकार को ठीक से समझ दो 
अहंकार नाना प्रकार के वाद विकार पैदा करेगा 
वाद का अंत करनेवाला संवाद ही हित करेगा










समर्थ रामदास स्वामी कृत मनाचे श्लोक ९१-१०० हिंदी अनुवाद सहित

नको वीट मानू रघूनायकाचा |
अती आदरे बोलिजे राम वाचा ||
न वेचे मुखी सापडे रे फुकाचा |
करी घोष त्या जानकीवल्लभाचा ||९१||
नामस्मरण से उकता गया ऐसा मत कहो 
आपकी वाचा तो आदरपुर्वक राम पर केंद्रित हो 
यदि आपकी वाणी में राम हैं तो आप उन्हें पायेंगे ही 
आपके मुंह से जानकीनायक राम का जयघोष हो

अती आदरे सर्वही नामघोषे |
गिरीकंदरी जाईजे दूरि दोषे ||
हरी तिष्ठतू तोषला नामघोषे |
विशेषे हरामानसी रामपीसे ||९२||
आपको आदरपुर्वक हरिनाम का उद्घोष करना हैं 
आपके दोष आपसे दूर गिरिकन्दराओं में भाग जायेंगे 
जहाँ नामघोष होता हैं वहां साक्षात् हरि निवास करते हैं 
इसीलिए शिवजी विशेषरूपसे हरि पर ध्यान लगाते हैं

जगी पाहता देव हा अन्नदाता |
तया लागली तत्त्वता सार चिंता ||
तयाचे मुखी नाम घेता फुकाचे |
मना सांग पा रे तुझे काय वेचे ||९३||
अन्नदाता तो परम दयालु परमेश्वर ही हैं 
तत्वरूपसे इस विश्व की सारी चिंता उसको हैं 
मुंह से हरिनाम लेना हैं 
और अपने कार्य में लगे रहना हैं

तिन्ही लोक जाळू शके कोप येता |
निवाला हरू तो मुखे नाम घेता ||
जपे आदरे पार्वती विश्वमाता |
म्हणोनी म्हणा तेचि हे नाम आता ||९४||
शिवजी तो क्रोधित होने से तीनों लोकों को जला सकते हैं 
लेकिन मुंह से रामनाम लेने से शिवजी शीतल हो जाते हैं 
माँ पार्वतीजी भी तो रामनाम में तल्लीन रहती हैं 
तो फिर क्या आप राम का नाम नहीं लेंगे

अजामेळ पापी वदे पुत्रकामे |
तया मुक्ति नारायणाचेनि नामे ||
शुकाकारणे कुंटणी राम वाणी |
मुखे बोलिता ख्याति जाली पुराणी ||९५||
अजामिल पापी पुत्र को बुलाने के लिए रामनाम लेता हैं 
रामनाम लेने मात्र से वो तर जाता हैं 
गणिका को भी रामनाम ने तारा
नामस्मरण करनेवाले पुराणों में विख्यात हुए

महाभक्त प्रल्हाद हा दैत्यकूळी |
जपे रामनामावळी नित्यकाळी ||
पिता पापरूपी तया देखवेना |
जनीं दैत्य तो नाम मूखे म्हणेना ||९६||
महाभक्त प्रल्हाद दैत्यकुल में जन्मे 
वे हरदम रामनाम का जाप करते थे 
उनके अहंकारी पिता से यह देखा न गया 
जो अहंकारी हैं उसे तो खुदका नाम चाहिए

मुखी नाम नाही तया मुक्ति कैची |
अहंतागुणे यातना ते फुकाची ||
पुढे अंत येईल तो दैन्यवाणा |
म्हणोनी म्हणा रे म्हणा देवराणा ||९७||
रामनाम के बिना तो मुक्ति सम्भव नहीं 
अहंकार में बढ़ौतरी होनेसे यातना होगी 
बड़ी ही दीनता से सब समाप्त हो जायेगा 
इसीलिए राम का स्मरण हमेशा बना रहे

हरीनाम नेमस्त पाषाण तारी |
बहू तारिले मानवी देहधारी ||
तया रामनामी सदा जो विकल्पी |
वदेना कदा जीव तो पापरूपी ||९८||
हरिनाम ने तो पत्थर भी तारे हैं 
रामनाम अंकित देह भी तरा हैं
रामनाम का जो विकल्प ढूंढ़ता हैं 
वह विमुख जीव तो पापरूप हैं

जगी धन्य वाराणसी पुण्यराशी |
तयेमाजि जाता गती पूर्वजांसी ||
मुखे रामनामावळी नित्यकाळी |
जिवा हीत सांगे सदा चंद्रमौळी ||९९||
धन्य हैं पुण्यनगरी वाराणसी 
जहाँ जानेसे पुरखो का भी उद्धार होता हैं 
मुंह में निरन्तर हरिनाम होने से क्या हो सकता हैं 
इसी बात को शिवजी वहां आनेवाले को बताते हैं

यथासांग रे कर्म तेही घडेना |
घडे धर्म ते पुण्यगाठी पडेना ||
दया पाहता सर्व भूती असेना |
फुकाचे मुखी नाम तेही वसेना ||१००||
शास्त्रोक्त रूप से कर्म करना नहीं आता 
खाते में पूण्य भी नहीं हैं जिससे धर्म में गति हो 
सब जीवों के प्रति दयाभाव भी नहीं हैं 
अब क्या रामनाम लेनेमें भी दिक्कत होती हैं



समर्थ रामदास स्वामी कृत मनाचे श्लोक ८१-९० हिंदी अनुवाद सहित

मना मत्सरे नाम सांडू नको हो |
अती आदरे हा निजध्यास राहो ||
समस्तांमधे नाम हे सार आहे |
दुजी तूळणा तूळिताही न साहे ||८१||
ईर्ष्या बढ़ेगी तो नाम छूट जायेगा 
आदरपूर्वक श्रीराम का ध्यान कर 
सभी साधनाओं में नाम ही सार हैं 
नाम स्मरण की तुलना कैसे हों

बहू नाम या रामनामी तुळेना |
अभाग्या नरा पामरा हे कळेना ||
विषा औषधा घेतले पार्वतीशे |
जिवा मानवा किंकरा कोण पूसे ||८२||
नाम तो राम ही का लेना 
सामान्य जीव के समझ में न आये 
शिवजी औषधि के रूप में सेवन करते हैं 
और सामान्य जन महिमा नहीं समझ पाते

जेणे जाळिला काम तो राम ध्यातो |
उमेसी अती आदरे गूण गातो ||
बहु ज्ञान वैराग्य सामर्थ्य जेथे |
परी अंतरी नामविश्वास तेथे ||८३||
काम को जलाने वाले शिवजी राम का ध्यान करते हैं 
उमा से आदरपूर्वक रामकथा कहते हैं 
जहाँ ज्ञान वैराग्य और सामर्थ्य हैं 
वही तो नाम स्मरण में विश्वास हैं

विठोने शिरी वाहिला देवराणा |
तया अंतरी ध्यास रे त्यासि नेणा ||
निवाला स्वये तापसी चंद्रमौळी |
जिवा सोडवी राम हा अंतकाळी ||८४||
विट्ठल शिवजी को अपने सर पर रखते हैं 
उन्हें तो जानो जो शिवजी के ह्रदय में हैं 
शिवजी अपने कठोर तप को रामनाम से शीतल करते हैं 
जीवन के अंतिम पलों में राम ही तो रक्षा करेंगे

भजा राम विश्राम योगेश्वरांचा |
जपू नेमिला नेम गौरीहराचा ||
स्वये नीववी तापसी चंद्रमौळी |
तुम्हां सोडवी राम हा अंतकाळी ||८५||
उस राम को भजे जो योगियों का विश्राम हैं 
जिसका स्मरण शिवपार्वती नियमपूर्वक करते हैं 
घनघोर तप करने वाले शिवजी रामनाम से शीतल हो जाते हैं

मुखी राम विश्राम तेथेचि आहे ।
सदानंद आनंद सेवोनि आहे ॥
तयावीण तो शीण संदेहकारी ।
निजधाम हे नाम शोकापहारी ॥८६॥
जब मुंह में राम हैं तभी तो विश्राम हैं 
क्या इस सदानंद का सेवन नहीं करना 
दूसरे काम से थकान और संदेह होगा 
रामनाम शोक का अंत करके निजधाम देगा

मुखी राम त्या काम बाधुं शकेना ।
गुणे इष्ट धारिष्ट त्याचे चुकेना ॥
हरीभक्त तो शक्त कामास भारी ।
जगीं धन्य तो मारुती ब्रह्मचारी ॥८७॥
मुंह में राम हैं तो काम की बाधा नहीं होंगी
गुण यदि सही हैं तो धैर्य गलत नहीं होंगा
हरिभक्ति से ही काम का अंत होगा 
ब्रह्मचारी हनुमान भक्ति से ही तो जाने जाते हैं

बहू चांगले नाम या राघवाचे |
अती साजिरे स्वल्प सोपे फुकाचे ||
करी मूळ निर्मूळ घेता भवाचे |
जिवा मानवा हेचि कैवल्य साचे ||८८||
रामनाम तो बड़ा ही सुन्दर हैं 
सुगम छोटा सरल निशुल्क हैं 
माया के समूल उच्चाटन में सक्षम हैं 
जीवों को कैवल्य प्रदान करनेवाला हैं

जनीं भोजनीं नाम वाचे वदावे |
अती आदरे गद्यघोषे म्हणावे ||
हरीचिंतने अन्न सेवीत जावे |
तरी श्रीहरी पाविजेतो स्वभावे ||८९||
भोजन के समय राम का स्मरण करे 
आदरपूर्वक नाम का उद्घोष करें
हरि चिंतन करते हुए अन्न सेवन करे 
फिर आप सहजरूपसे श्रीहरि को पाएंगे

न ये राम वाणी तया थोर हाणी |
जनीं व्यर्थ प्राणी तया नाम काणी ||
हरीनाम हे वेदशास्त्री पुराणी |
बहू आगळे बोलिली व्यासवाणी ||९०||
यदि वाणी में राम नहीं हैं तो भारी क्षति हो रही हैं 
ऐसे प्राणी का जीवन तो बेकार हैं 
पुराणों और वेदों में तो केवल हरिनाम की चर्चा हैं 
क्या अद्भुत बात कहीं हैं व्यास वाणी ने







समर्थ रामदास स्वामी कृत मनाचे श्लोक ७१-८० हिंदी अनुवाद सहित


जयाचेनि नामे महादोष जाती |
जयाचेनि नामे गती पाविजेती ||
जयाचेनि नावे घडे पुण्यठेवा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||७१||

जिसके नामस्मरण से महादोष नष्ट होते हैं 
जिसके नामस्मरण से सद्गति मिलती हैं 
जिससे आप द्वन्द्वों के ऊपर उठ सकते हैं 
प्रातःकाल उस राम का चिंतन करे

न वेचे कदा ग्रंथिचे अर्थ काही |
मुखे नाम उच्चारिता कष्ट नाही ||
महाघोर संसारशत्रू जिणावा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||७२||

ग्रंथों का अध्ययन करना मुश्किल हैं 
मुंह से नाम लेना तो आसान हैं 
मनमानी करना माने खुद से शत्रुता करना 
क्यों नहीं प्रातःकाल राम नाम समरण करना

देहेदंडणेचे महादुःख आहे |
महादुःख ते नाम घेता न राहे ||
सदाशीव चिंतीतसे देवदेवा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||७३||

हठयोग में तो बड़ी पीड़ा होती हैं 
यदि मुहं में नाम हैं तो पीड़ा कैसी 
शिवजी इसी तत्व का चिंतन करते हैं 
प्रातःकाल राम का चिंतन करे

बहुतांपरी संकटे साधनांची |
व्रते दान उद्यापने ती धनाची ||
दिनाचा दयाळू मनी आठवावा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||७४||

साधनामार्ग में तो बड़ी विपत्तियां आती हैं 
व्रत दान अधिष्ठान में तो बड़ा खर्चा होता हैं
हम तो दीनों में रूचि रखनेवाले राम को स्मरें
प्रातःकाल बस रामही का चिंतन करें

समस्तांमधे सार साचार आहे |
कळेना तरी सर्व शोधून पाहे ||
जिवा संशयो वाउगा तो त्यजावा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||७५||

सब बातों का सार तो सदाचार हैं 
यदि समझता नहीं तो स्वयं ढूंढे 
कोई भी संदेह मन में बैठ न जाए 
प्रातःकाल श्रीराम का चिंतन करे

नव्हे कर्म ना धर्म ना योग काही |
नव्हे भोग ना त्याग ना सांग पाही ||
म्हणे दास विश्वास नामी धरावा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||७६||

कर्म धर्म और योग की बात नहीं हैं
भोग त्याग या कोई निर्देश नहीं हैं 
केवल नाम में विश्वास जगाइए 
प्रातःकाल श्रीराम का स्मरण कीजिये

करी काम निष्काम या राघवाचे |
करी रूप स्वरूप सर्वां जिवांचे ||
करी छंद निर्द्वंद्व हे गूण गाता |
हरीकीर्तनी वृत्तिविश्वास होता ||७७||

निष्काम कर्म में ही तो राम हैं 
प्राणिमात्र में परमात्मा देखना ही तो स्वरुप बोध हैं 
राम का गुणगान आपको द्वन्द्वों से ऊपर उठाएगा 
हरी कीर्तन में आपकी सहज प्रवृत्ति हो जाए

अहो ज्या नरा रामविश्वास नाही |
तया पामरा बाधिजे सर्व काही ||
महारज तो स्वामि कैवल्यदाता |
वृथा वाहणे देहसंसारचिंता ||७८||

जिस नर को राम नाम में विश्वास नहीं 
उसे तो हर जगह प्रतिकूलता ही होगी 
राम कैवल्य के दाता हैं 
नश्वर देह में शाश्वत आसक्ति किस काम की

मना पावना भावना राघवाची |
धरी अंतरी सोडि चिंता भवाची ||
भवाची जिवा मानवा भूलि ठेली |
नसे वस्तुची धारणा व्यर्थ गेली ||७९||
वह भावना पावन हैं जिसमे राम हैं 
उसी भावना में रहे दूसरी चिंता न करे 
माया का भूलभुलैया हैं 
जो नहीं हैं सो नहीं हैं

धरा श्रीवरा त्या हरा अंतराते |
तरा दुस्तरा त्या परा सागराते ||
सरा वीसरा त्या भरा दुर्भराते |
करा नीकरा त्या खरा मत्सराते ||८०||
शिवजी के ह्रदय में विराजित राम का ध्यान धरे 
इसीसे तो दुस्तर भवसागर पार हो पाओगे 
मन की तृष्णा तो कभी पूरी नहीं होंगी 
जिस मन में मत्सर हैं उसमे राम कैसे होंगे



समर्थ रामदास स्वामी कृत मनाचे श्लोक ६१-७० हिंदी अनुवाद सहित

उभा कल्पवृक्षातळी दुःख वाहे |
तया अंतरी सर्वदा तेचि आहे ||
जनीं सज्जनीं वाद हा वाढवावा |
पुढे मागुता शोक जीवी धरावा ||६१||
आप के पास तो कल्पवृक्ष हैं
और आप छाव की खोज में हो
आप यदि विवादों में ही उलझते हैं
तो आपको शोक ही तो होगा

निजध्यास तो सर्व तूटोनी गेला |
बळे अंतरी शोक संताप ठेला ||
सुखानंद आनंद भेदे बुडाला |
मना निश्चयो सर्व खेदे उडाला ||६२||
ध्यान धारणा साधना से तो विमुख हुए
दुःख और क्रोध से अपने मन को भर लिया
सुख और आनंद में अब भेद नहीं हो पा रहा
अब संशय रह गया निश्चय चला गया

घरी कामधेनू पुढे ताक मागे |
हरीबोध सांडोनि वेवाद लागे ||
करी सार चिंतामणी काचखंडे |
तया मागता देत आहे उदंडे ||६३||
आपके पास कामधेनु हैं और दूसरों से छाज मांगते हो
अपने भीतर राम का बोध नहीं जगाते औरों से विवाद करते हो
हिरा छोड़कर कांच के टुकड़ों के पीछे जाते हों
कांच के टुकड़े तो मांगने से बहोत मिल जायेंगे

 अती मूढ त्या दृढ बुद्धी असेना |
अती काम त्या राम चित्ती वसेना ||
अती लोभ त्या क्षोभ होईल जाणा |
अती वीषयी सर्वदा दैन्यवाणा ||६४||
जहाँ मूढ़ता हैं वहां दृढ़ बुद्धि कैसे 
कामी के चित्त में राम कैसे 
लोभ का अंजाम तो क्षोभ ही हैं 
विषयी मन तो बड़ा ही दीन हैं 

नको दैन्यवाणे जिणे भक्तिऊणे |
अती मूर्ख त्या सर्वदा दुःख दूणे ||
धरी रे मना आदरे प्रीति रामी |
नको वासना हेमधामी विरामी ||६५||
वह जीना क्या जिसमे भक्ति न हो 
मूर्खता करने से दुःख तो दुगुना हो जायेगा 
हे मन सम्मान सहित प्रीती तो राम ही से हो 
सोने के महलों में भी तेरी आसक्ति न हों

नव्हे सार संसार हा घोर आहे |
मना सज्जना सत्य शोधूनि पाहे ||
जनीं वीष खाता पुढे सूख कैचे |
करी रे मना ध्यान या राघवाचे ||६६||
यह संसार तो बड़ा ही सारहीन हैं 
सार तत्व खोज के निकालना होगा 
क्या विषसेवन से सुख मिलेगा 
हे मन तू राम का ध्यान क्यों नहीं करता

घनश्याम हा राम लावण्यरूपी |
महाधीर गंभीर पूर्णप्रतापी ||
करी संकटी सेवकांचा कुडावा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||६७||
घनश्याम राम तो अति सुन्दर हैं 
धीर गम्भीर और पूर्ण प्रतापी हैं 
संकटों में भक्तों की रक्षा करते हैं 
प्रातःकाल राम का चिंतन करे

बळे आगळा राम कोदंडधारी |
महाकाळ विक्राळ तोही थरारी ||
पुढे मानवा किंकरा कोण केवा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||६८||
कोदण्डधारी राम तो बड़े बलवान हैं 
विकराल महाकाल भी उनसे भयभीत हैं 
सामान्य मनुष्यों की तो बात ही क्या 
प्रातःकाल श्रीराम का चिंतन करें
सुखानंदकारी निवारी भयाते |
जनीं भक्तिभावे भजावे तयाते ||
विवेके त्यजावा अनाचार हेवा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||६९||
सुखानंद का दाता ही भय का निवारण करेगा 
राम का भजन अत्यंत भक्तिभाव से करे 
विवेकी बने दुराचार ईर्ष्या न करे 
प्रातःकाल श्रीराम का स्मरण करे

सदा रामनामे वदा पूर्णकामे |
कदा बाधिजेना पदा नित्य नेमे ||
मदालस्य हा सर्व सोडोनि द्यावा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||७०||
रामनाम से युक्त काम से रहित
बुरे विचारों की कोई बाधा न होगी
अभिमान और आलस्य त्याग दे
प्रातःकाल श्रीराम का स्मरण करे