Saturday, 25 June 2016

समर्थ रामदास स्वामी कृत मनाचे श्लोक ८१-९० हिंदी अनुवाद सहित

मना मत्सरे नाम सांडू नको हो |
अती आदरे हा निजध्यास राहो ||
समस्तांमधे नाम हे सार आहे |
दुजी तूळणा तूळिताही न साहे ||८१||
ईर्ष्या बढ़ेगी तो नाम छूट जायेगा 
आदरपूर्वक श्रीराम का ध्यान कर 
सभी साधनाओं में नाम ही सार हैं 
नाम स्मरण की तुलना कैसे हों

बहू नाम या रामनामी तुळेना |
अभाग्या नरा पामरा हे कळेना ||
विषा औषधा घेतले पार्वतीशे |
जिवा मानवा किंकरा कोण पूसे ||८२||
नाम तो राम ही का लेना 
सामान्य जीव के समझ में न आये 
शिवजी औषधि के रूप में सेवन करते हैं 
और सामान्य जन महिमा नहीं समझ पाते

जेणे जाळिला काम तो राम ध्यातो |
उमेसी अती आदरे गूण गातो ||
बहु ज्ञान वैराग्य सामर्थ्य जेथे |
परी अंतरी नामविश्वास तेथे ||८३||
काम को जलाने वाले शिवजी राम का ध्यान करते हैं 
उमा से आदरपूर्वक रामकथा कहते हैं 
जहाँ ज्ञान वैराग्य और सामर्थ्य हैं 
वही तो नाम स्मरण में विश्वास हैं

विठोने शिरी वाहिला देवराणा |
तया अंतरी ध्यास रे त्यासि नेणा ||
निवाला स्वये तापसी चंद्रमौळी |
जिवा सोडवी राम हा अंतकाळी ||८४||
विट्ठल शिवजी को अपने सर पर रखते हैं 
उन्हें तो जानो जो शिवजी के ह्रदय में हैं 
शिवजी अपने कठोर तप को रामनाम से शीतल करते हैं 
जीवन के अंतिम पलों में राम ही तो रक्षा करेंगे

भजा राम विश्राम योगेश्वरांचा |
जपू नेमिला नेम गौरीहराचा ||
स्वये नीववी तापसी चंद्रमौळी |
तुम्हां सोडवी राम हा अंतकाळी ||८५||
उस राम को भजे जो योगियों का विश्राम हैं 
जिसका स्मरण शिवपार्वती नियमपूर्वक करते हैं 
घनघोर तप करने वाले शिवजी रामनाम से शीतल हो जाते हैं

मुखी राम विश्राम तेथेचि आहे ।
सदानंद आनंद सेवोनि आहे ॥
तयावीण तो शीण संदेहकारी ।
निजधाम हे नाम शोकापहारी ॥८६॥
जब मुंह में राम हैं तभी तो विश्राम हैं 
क्या इस सदानंद का सेवन नहीं करना 
दूसरे काम से थकान और संदेह होगा 
रामनाम शोक का अंत करके निजधाम देगा

मुखी राम त्या काम बाधुं शकेना ।
गुणे इष्ट धारिष्ट त्याचे चुकेना ॥
हरीभक्त तो शक्त कामास भारी ।
जगीं धन्य तो मारुती ब्रह्मचारी ॥८७॥
मुंह में राम हैं तो काम की बाधा नहीं होंगी
गुण यदि सही हैं तो धैर्य गलत नहीं होंगा
हरिभक्ति से ही काम का अंत होगा 
ब्रह्मचारी हनुमान भक्ति से ही तो जाने जाते हैं

बहू चांगले नाम या राघवाचे |
अती साजिरे स्वल्प सोपे फुकाचे ||
करी मूळ निर्मूळ घेता भवाचे |
जिवा मानवा हेचि कैवल्य साचे ||८८||
रामनाम तो बड़ा ही सुन्दर हैं 
सुगम छोटा सरल निशुल्क हैं 
माया के समूल उच्चाटन में सक्षम हैं 
जीवों को कैवल्य प्रदान करनेवाला हैं

जनीं भोजनीं नाम वाचे वदावे |
अती आदरे गद्यघोषे म्हणावे ||
हरीचिंतने अन्न सेवीत जावे |
तरी श्रीहरी पाविजेतो स्वभावे ||८९||
भोजन के समय राम का स्मरण करे 
आदरपूर्वक नाम का उद्घोष करें
हरि चिंतन करते हुए अन्न सेवन करे 
फिर आप सहजरूपसे श्रीहरि को पाएंगे

न ये राम वाणी तया थोर हाणी |
जनीं व्यर्थ प्राणी तया नाम काणी ||
हरीनाम हे वेदशास्त्री पुराणी |
बहू आगळे बोलिली व्यासवाणी ||९०||
यदि वाणी में राम नहीं हैं तो भारी क्षति हो रही हैं 
ऐसे प्राणी का जीवन तो बेकार हैं 
पुराणों और वेदों में तो केवल हरिनाम की चर्चा हैं 
क्या अद्भुत बात कहीं हैं व्यास वाणी ने







समर्थ रामदास स्वामी कृत मनाचे श्लोक ७१-८० हिंदी अनुवाद सहित


जयाचेनि नामे महादोष जाती |
जयाचेनि नामे गती पाविजेती ||
जयाचेनि नावे घडे पुण्यठेवा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||७१||

जिसके नामस्मरण से महादोष नष्ट होते हैं 
जिसके नामस्मरण से सद्गति मिलती हैं 
जिससे आप द्वन्द्वों के ऊपर उठ सकते हैं 
प्रातःकाल उस राम का चिंतन करे

न वेचे कदा ग्रंथिचे अर्थ काही |
मुखे नाम उच्चारिता कष्ट नाही ||
महाघोर संसारशत्रू जिणावा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||७२||

ग्रंथों का अध्ययन करना मुश्किल हैं 
मुंह से नाम लेना तो आसान हैं 
मनमानी करना माने खुद से शत्रुता करना 
क्यों नहीं प्रातःकाल राम नाम समरण करना

देहेदंडणेचे महादुःख आहे |
महादुःख ते नाम घेता न राहे ||
सदाशीव चिंतीतसे देवदेवा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||७३||

हठयोग में तो बड़ी पीड़ा होती हैं 
यदि मुहं में नाम हैं तो पीड़ा कैसी 
शिवजी इसी तत्व का चिंतन करते हैं 
प्रातःकाल राम का चिंतन करे

बहुतांपरी संकटे साधनांची |
व्रते दान उद्यापने ती धनाची ||
दिनाचा दयाळू मनी आठवावा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||७४||

साधनामार्ग में तो बड़ी विपत्तियां आती हैं 
व्रत दान अधिष्ठान में तो बड़ा खर्चा होता हैं
हम तो दीनों में रूचि रखनेवाले राम को स्मरें
प्रातःकाल बस रामही का चिंतन करें

समस्तांमधे सार साचार आहे |
कळेना तरी सर्व शोधून पाहे ||
जिवा संशयो वाउगा तो त्यजावा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||७५||

सब बातों का सार तो सदाचार हैं 
यदि समझता नहीं तो स्वयं ढूंढे 
कोई भी संदेह मन में बैठ न जाए 
प्रातःकाल श्रीराम का चिंतन करे

नव्हे कर्म ना धर्म ना योग काही |
नव्हे भोग ना त्याग ना सांग पाही ||
म्हणे दास विश्वास नामी धरावा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||७६||

कर्म धर्म और योग की बात नहीं हैं
भोग त्याग या कोई निर्देश नहीं हैं 
केवल नाम में विश्वास जगाइए 
प्रातःकाल श्रीराम का स्मरण कीजिये

करी काम निष्काम या राघवाचे |
करी रूप स्वरूप सर्वां जिवांचे ||
करी छंद निर्द्वंद्व हे गूण गाता |
हरीकीर्तनी वृत्तिविश्वास होता ||७७||

निष्काम कर्म में ही तो राम हैं 
प्राणिमात्र में परमात्मा देखना ही तो स्वरुप बोध हैं 
राम का गुणगान आपको द्वन्द्वों से ऊपर उठाएगा 
हरी कीर्तन में आपकी सहज प्रवृत्ति हो जाए

अहो ज्या नरा रामविश्वास नाही |
तया पामरा बाधिजे सर्व काही ||
महारज तो स्वामि कैवल्यदाता |
वृथा वाहणे देहसंसारचिंता ||७८||

जिस नर को राम नाम में विश्वास नहीं 
उसे तो हर जगह प्रतिकूलता ही होगी 
राम कैवल्य के दाता हैं 
नश्वर देह में शाश्वत आसक्ति किस काम की

मना पावना भावना राघवाची |
धरी अंतरी सोडि चिंता भवाची ||
भवाची जिवा मानवा भूलि ठेली |
नसे वस्तुची धारणा व्यर्थ गेली ||७९||
वह भावना पावन हैं जिसमे राम हैं 
उसी भावना में रहे दूसरी चिंता न करे 
माया का भूलभुलैया हैं 
जो नहीं हैं सो नहीं हैं

धरा श्रीवरा त्या हरा अंतराते |
तरा दुस्तरा त्या परा सागराते ||
सरा वीसरा त्या भरा दुर्भराते |
करा नीकरा त्या खरा मत्सराते ||८०||
शिवजी के ह्रदय में विराजित राम का ध्यान धरे 
इसीसे तो दुस्तर भवसागर पार हो पाओगे 
मन की तृष्णा तो कभी पूरी नहीं होंगी 
जिस मन में मत्सर हैं उसमे राम कैसे होंगे



समर्थ रामदास स्वामी कृत मनाचे श्लोक ६१-७० हिंदी अनुवाद सहित

उभा कल्पवृक्षातळी दुःख वाहे |
तया अंतरी सर्वदा तेचि आहे ||
जनीं सज्जनीं वाद हा वाढवावा |
पुढे मागुता शोक जीवी धरावा ||६१||
आप के पास तो कल्पवृक्ष हैं
और आप छाव की खोज में हो
आप यदि विवादों में ही उलझते हैं
तो आपको शोक ही तो होगा

निजध्यास तो सर्व तूटोनी गेला |
बळे अंतरी शोक संताप ठेला ||
सुखानंद आनंद भेदे बुडाला |
मना निश्चयो सर्व खेदे उडाला ||६२||
ध्यान धारणा साधना से तो विमुख हुए
दुःख और क्रोध से अपने मन को भर लिया
सुख और आनंद में अब भेद नहीं हो पा रहा
अब संशय रह गया निश्चय चला गया

घरी कामधेनू पुढे ताक मागे |
हरीबोध सांडोनि वेवाद लागे ||
करी सार चिंतामणी काचखंडे |
तया मागता देत आहे उदंडे ||६३||
आपके पास कामधेनु हैं और दूसरों से छाज मांगते हो
अपने भीतर राम का बोध नहीं जगाते औरों से विवाद करते हो
हिरा छोड़कर कांच के टुकड़ों के पीछे जाते हों
कांच के टुकड़े तो मांगने से बहोत मिल जायेंगे

 अती मूढ त्या दृढ बुद्धी असेना |
अती काम त्या राम चित्ती वसेना ||
अती लोभ त्या क्षोभ होईल जाणा |
अती वीषयी सर्वदा दैन्यवाणा ||६४||
जहाँ मूढ़ता हैं वहां दृढ़ बुद्धि कैसे 
कामी के चित्त में राम कैसे 
लोभ का अंजाम तो क्षोभ ही हैं 
विषयी मन तो बड़ा ही दीन हैं 

नको दैन्यवाणे जिणे भक्तिऊणे |
अती मूर्ख त्या सर्वदा दुःख दूणे ||
धरी रे मना आदरे प्रीति रामी |
नको वासना हेमधामी विरामी ||६५||
वह जीना क्या जिसमे भक्ति न हो 
मूर्खता करने से दुःख तो दुगुना हो जायेगा 
हे मन सम्मान सहित प्रीती तो राम ही से हो 
सोने के महलों में भी तेरी आसक्ति न हों

नव्हे सार संसार हा घोर आहे |
मना सज्जना सत्य शोधूनि पाहे ||
जनीं वीष खाता पुढे सूख कैचे |
करी रे मना ध्यान या राघवाचे ||६६||
यह संसार तो बड़ा ही सारहीन हैं 
सार तत्व खोज के निकालना होगा 
क्या विषसेवन से सुख मिलेगा 
हे मन तू राम का ध्यान क्यों नहीं करता

घनश्याम हा राम लावण्यरूपी |
महाधीर गंभीर पूर्णप्रतापी ||
करी संकटी सेवकांचा कुडावा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||६७||
घनश्याम राम तो अति सुन्दर हैं 
धीर गम्भीर और पूर्ण प्रतापी हैं 
संकटों में भक्तों की रक्षा करते हैं 
प्रातःकाल राम का चिंतन करे

बळे आगळा राम कोदंडधारी |
महाकाळ विक्राळ तोही थरारी ||
पुढे मानवा किंकरा कोण केवा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||६८||
कोदण्डधारी राम तो बड़े बलवान हैं 
विकराल महाकाल भी उनसे भयभीत हैं 
सामान्य मनुष्यों की तो बात ही क्या 
प्रातःकाल श्रीराम का चिंतन करें
सुखानंदकारी निवारी भयाते |
जनीं भक्तिभावे भजावे तयाते ||
विवेके त्यजावा अनाचार हेवा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||६९||
सुखानंद का दाता ही भय का निवारण करेगा 
राम का भजन अत्यंत भक्तिभाव से करे 
विवेकी बने दुराचार ईर्ष्या न करे 
प्रातःकाल श्रीराम का स्मरण करे

सदा रामनामे वदा पूर्णकामे |
कदा बाधिजेना पदा नित्य नेमे ||
मदालस्य हा सर्व सोडोनि द्यावा |
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||७०||
रामनाम से युक्त काम से रहित
बुरे विचारों की कोई बाधा न होगी
अभिमान और आलस्य त्याग दे
प्रातःकाल श्रीराम का स्मरण करे





Thursday, 23 June 2016

समर्थ रामदास स्वामी कृत मनाचे श्लोक ५१-६० हिंदी अनुवाद सहित

मदे मत्सरे सांडिली स्वार्थबुद्धी |
प्रपंचीक नाही जयाते उपाधी ||
सदा बोलणे नम्र वाचा सुवाचा |
जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ||५१||

जो मद मत्सर और स्वार्थ से रहित हैं
जो मिथ्या बातों में व्यर्थ उलझता नहीं
जो विनम्रता से अच्छे वचन बोलता हैं
वहीँ तो सर्वोत्तम का दास कहलाता हैं

क्रमी वेळ जो तत्त्वचिंतानुवादे |
न लिंपे कदा दंभ वादे विवादे ||
करी सूखसंवाद जो ऊगमाचा |
जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ||५२||

जो तत्व चिंतन में अपना समय देता हैं
जो दम्भिक वाद विवादों में उलझता नहीं
जो सुखपूर्वक मूल तत्त्व पर संवाद करता हैं
वही तो सच्चा दस हैं सर्वोत्तम का

सदा आर्जवी प्रीय जो सर्व लोकी |
सदा सर्वदा सत्यवादी विवेकी ||
न बोले कदा मिथ्य वाचा त्रिवाचा |
जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ||५३||

लोककल्याण में तत्पर सबका प्रिय
हर वक़्त सत्यवादी और विवेकपूर्ण
जो कभी मिथ्या बातें नहीं करता हैं
वही तो सर्वोत्तम का दास माना जाता हैं

सदा सेवि आरण्य तारुण्यकाळी |
मिळेना कदा कल्पनेचेनि मेळी ||
चळेना मनी निश्चयो दृढ ज्याचा |
जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ||५४||

जो युवावस्था में सुख चैन में लिप्त नहीं होता
बैठे बैठे इधर उधर की कल्पनाओं में नहीं उलझता
जिसका दृढ़ निश्चय कभी डिगता नहीं हैं
वही तो सर्वोत्तम का दास कहलाता हैं

नसे मानसी नष्ट आशा दुराशा |
वसे अंतरी प्रेमपाशा पिपाशा ||
ऋणी देव हा भक्तिभावे जयाचा |
जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ||५५||

जिसके मन में व्यर्थ की आशा दुराशाओं का जंजाल नहीं
जिसके ह्रदय में प्राणिमात्र के प्रति प्रेम और सद्भावना हैं
ईश्वरीय तत्त्व जिसके ऊपर परम संतुष्ट हैं
वही तो सर्वोत्तम का दास कहलाता हैं

दिनाचा दयाळू मनाचा मवाळू |
स्नेहाळू कृपाळू जनीं दासपाळू ||
तया अंतरी क्रोध संताप कैचा |
जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ||५६||

दीनों के प्रति दया और मृदुता जहाँ हैं
दासों से स्नेह और कृपादृष्टि रखता हैं
जिसके भीतर क्रोध का लेश नहीं हैं
वही तो सर्वोत्तम का दास माना जायेगा

जगी होइजे धन्य या रामनामे |
क्रिया भक्ति ऊपासना नित्य नेमें ||
उदासीनता तत्त्वता सार आहे |
सदा सर्वदा मोकळी वृत्ति राहे ||५७||

दुनिया में आकर रामनाम में ही तो रमना हैं
कर्म भक्ति और उपासना में निरंतरता रखनी हैं
द्वन्द्वों से ऊपर उठना ही सब तत्त्वों का सार हैं
हमारा चित्त हरदम सरल रहना चाहिए

नको वासना वीषयी वृत्तिरूपे |
पदार्थी जडे कामना पूर्वपापे ||
सदा राम निष्काम चिंतीत जावा |
मना कल्पनालेश तोहि नसावा ||५८||

वासनाएं हमारे मन में कही प्रवृत्ति न बन जाए
स्थूल विषय यदि हावी हैं तो यह कमजोरी हैं
राम का चिंतन बिना किसी मतलब से करे
मन में किसी कल्पना का लेश भी न हो

मना कल्पना कल्पिता कल्पकोटी |
नव्हे रे नव्हे सर्वथा रामभेटी ||
मनी कामना राम नही जयाला |
अती आदरे प्रीति नाहि तयाला ||५९||

कल्पनाओं के महल खड़े करके
क्या राम से मुलाकात हो जाएगी
अंतर्यामी राम की अनुभूति में ही रस हो
इसी विषय में सब आदर और प्रीती रहे

मना राम कल्पतरू कामधेनू |
निधी सार चिंतामणी काय वानू ||
जयाचेनि योगे घडे सर्व सत्ता |
तया साम्यता कायसी कोण आता ||६०||

राम तो कल्पतरु हैं कामधेनु हैं
चिंतामणि हैं सबसे बड़ा निधि हैं
जो सभी सत्ताओं का केंद्र हैं
उसके समान दूसरा कोई नहीं

Wednesday, 22 June 2016

समर्थ रामदास स्वामी कृत मनाचे श्लोक ४१-५० हिंदी अनुवाद सहित

बहू हिंडता सौख्य होणार नाही |
शिणावे परी नातुडे हीत काही ||
विचारे बरे अंतरा बोधवीजे |
मना सज्जना राघवी वस्ति कीजे ||४१||

बहोत भटकने से क्या हासिल होगा
सिर्फ थक जाओगे कुछ न पाओगे
सोचिए और अंतःकरण में बोध जगाइए
सज्जनो के संग राम में रंग जाइये

बहुतांपरी हेचि आता धरावे |
रघूनायका आपुलेसे करावे ||
दिनानाथ हे तोडरी ब्रीद गाजे |
मना सज्जना राघवी वस्ति कीजे ||४२||

अभी और विकल्प नहीं ढूंढने हैं
रामजी को अपना बनाना हैं
जिसके पैरों की आहट कहती हैं कि वह दीनानाथ हैं
सज्जनो के संग उसी राम में रंग जाना हैं

मना सज्जना एक जीवी धरावे |
जनीं आपुले हीत तुवां करावे ||
रघूनायकावीण बोलो नको हो |
सदा मानसी तो निजध्यास राहो ||४३||

हे सत्यशील मन अब एक ही बात को पकड़ ले
इस लोक में अपने हित को तू साध ले
जिसमे राम न हो वो बात न हो
मेरे मन अब तो स्वरुप में ही एकाग्र हो जा

मना रे जनीं मौनमुद्रा धरावी |
कथा आदरे राघवाची करावी ||
नसे राम ते धाम सोडूनि द्यावे |
सुखालागि आरण्य सेवीत जावे ||४४||

मेरे मन लोगो के बिच बहोत बतिया के क्या मिलेगा
लोगों में तो आदरपूर्वक रामकथा का गान कर
जिस घर में राम नहीं वहाँ तेरा काम नहीं
सुख तो सहजता से प्रकृति के सान्निध्य में ही मिलेगा

जयाचेनि संगे समाधान भंगे |
अहंता अकस्मात येऊनि लागे ||
तये संगतीची जनीं कोण गोडी |
जिये संगतीने मती राम सोडी ||४५||

जिसके संग चित्त की समता टूटती हैं
चित्त में अचानक अहंकार आता हैं
ऐसे संग की भला क्या मिठास हैं
जो संग बुद्धि को राम से अलग करता हैं

मना जे घडी राघवेवीण गेली |
जनीं आपुली ते तुवा हानि केली ||
रघूनायकावीण तो शीण आहे |
जनीं दक्ष तो लक्ष लावूनि पाहे ||४६||

मेरे मन वो पल जिनमे राम नहीं हैं
ऐसे पल तो केवल हानि पहुंचाते हैं
एक राम को भूलने से तो सब श्रम ही हैं
जो जागृत हैं उसका ध्यान राम पर हैं

मनीं लोचनी श्रीहरी तोचि पाहे |
जनीं जाणता भक्त होऊनि राहे ||
गुणी प्रीति राखे क्रमूं साधनाचा |
जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ||४७||

श्रीहरि नयन मन में तब दिखेंगे
जब ह्रदय में भक्ति जागेगी
गुणों में प्रीती और साधना बनाए रखना
तभी तो सर्वोत्तम के दास माने जाओगे

सदा देवकाजी झिजे देह ज्याचा |
सदा रामनामे वदे नित्य वाचा ||
स्वधर्मेचि चाले सदा उत्तमाचा |
जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ||४८||

ईश्वरीय कार्य के लिए जो समर्पित हैं
जिसकी जिव्हा पर निरन्तर राम नाम हैं
जो स्वधर्म पर उत्तमता से अटल हैं
वही सर्वोत्तम का दास माना जायेगा

सदा बोलण्यासारिखे चालताहे |
अनेकी सदा एक देवासि पाहे ||
सगूणी भजे लेश नाही भ्रमाचा |
जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ||४९||

जो वही करता हैं जो वह बोलता हैं
अनेक रूपों में भी जो एक परमात्मा का दर्शन करता हैं
परमात्मा को सगुण साकार रूप में बिना भ्रम के भजता हैं
वही तो सर्वोत्तम का दास माना जायेगा

नसे अंतरी काम नानाविकारी |
उदासीन जो तापसी ब्रह्मचारी ||
निवाला मनीं लेश नाही तमाचा |
जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ||५०||

जिसके अंतर में कामादि विकार नहीं हैं
जो सर्वव्यापी ब्रह्म से एकरूप और द्वन्द्वों से ऊपर हैं
जिसका मन सधा हुआ हैं और तामसिक नहीं हैं
वही तो सर्वोत्तम का दास कहलाता हैं

समर्थ रामदास स्वामी कृत मनाचे श्लोक ३१-४० हिंदी अनुवाद सहित

महासंकटी सोडिले देव जेणे |
प्रतापे बळे आगळा सर्वगूणे ||
जयाते स्मरे शैलजा शूलपाणी |
नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी ||३१||

संकटकाल में जिसने देवताओं को छुड़ाया
जो प्रतापी बलवान और विशेष सर्वगुण संपन्न हैं
जिसका समरण शंकर पारवती भी करते हैं
अपने भक्तों की उपेक्षा राम कभी नहीं करते हैं

अहल्या शिळा राघवे मुक्त केली |
पदी लागता दिव्य होऊनि गेली ||
जया वर्णिता शीणली वेदवाणी |
नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी ||३२||

पत्थर बनी अहल्या राम ने मुक्त की
चरण स्पर्श हुआ तो वह दिव्य हो गयी
जिसका सही आकलन तो वेद भी न कर पाये
वे राम अपने भक्तों की उपेक्षा नहीं करते

वसे मेरुमांदार हे सृष्टिलीला |
शशी सूर्य तारांगणे मेघमाळा ||
चिरंजीव केले जनीं दास दोन्ही |
नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी ||३३||

मेरु और अन्य सृष्टि को जिसने धारण किया हैं
चन्द्र सूर्य और मेघमाला जिसके आश्रित हैं
जिसने अपने दो दासों को चिरंजीव किया
वे राम अपने भक्तों की उपेक्षा नहीं करते

उपेक्षा कदा रामरूपी असेना |
जिवा मानवा निश्चयो तो वसेना ||
शिरी भार वाहेन बोले पुराणी |
नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी ||३४||

राम की उपेक्षा न करे
यह निश्चय कठिन हैं
पुराण कहते हैं कि राम सब पूरा करेंगे
राम अपने भक्तों की उपेक्षा नहीं करते

असे हो जया अंतरी भाव जैसा |
वसे हो तया अंतरी देव तैसा ||
अनन्यास रक्षीतसे चापपाणी |
नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी ||३५||

जिसके भीतर जैसा भाव होता हैं
उसके पास वैसा ही देव होता हैं
जो अनन्य रूप से शरणागत हैं
उसकी राम उपेक्षा नहीं करते

सदा सर्वदा देव सन्नीध आहे |
कृपाळूपणे अल्प धारिष्ट पाहे ||
सुखानंद आनंद कैवल्यदानी |
नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी ||३६||

राम सदैव आपके निकट हैं
वह कृपावंत थोड़ा धैर्य चाहते हैं
वो सुख आनंद कैवल्य का दान देंगे
अपने दासों की राम उपेक्षा नहीं करते

सदा चक्रवाकासि मार्तंड जैसा |
उडी घालितो संकटी स्वामि तैसा ||
हरीभक्तिचा घाव गाजे निशाणी |
नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी ||३७||

चक्रवाक के लिए जैसा सूर्य
वैसा ही भक्तों के लिए राम
इस बात का डंका तो पुराणों में हैं
अपने दासों की राम उपेक्षा नहीं करते

मना प्रार्थना तूजला एक आहे |
रघूराज थक्कीत होऊनि पाहे ||
अवज्ञा कदा हो यदर्थी न कीजे |
मना सज्जना राघवी वस्ति कीजे ||३८||

हे मन तुझसे एक ही प्रार्थना हैं
रघुनाथ तेरी ओर देख रहे हैं
उनकी अवज्ञा मत कर
सज्जनो के संग राम में रंग जा

जया वर्णिती वेद शास्त्रे पुराणे |
जयाचेनि योगे समाधान बाणे ||
तयालागि हे सर्व चांचल्य दीजे |
मना सज्जना राघवी वस्ति कीजे ||३९||

वेद शास्त्र और पुराण जिसका बखान करते हैं
जिससे आपको समाधान मिल सकता हैं
अपने मन की चंचलता उसे दे दे
सज्जनो के संग राम में रंग जाइये

मना पाविजे सर्वही सूख जेथे |
अती आदरे ठेविजे लक्ष तेथे ||
विवेके कुडी कल्पना पालटीजे |
मना सज्जना राघवी वस्ति कीजे ||४०||

जो आपको सब सुख प्रदान कर सकता हैं
उसकी ओर बड़े आदर से अपना ध्यान लगाए
विवेक द्वारा व्यर्थ कल्पनाओं को बदले
सज्जनो के संग राम में रंग जाये

समर्थ रामदास स्वामी कृत मनाचे श्लोक २१ - ३० हिंदी अनुवाद सहित

मना वासना चूकवी येरझारा |
मना कामना सोडि रे द्रव्यदारा ||
मना यातना थोर हे गर्भवासी |
मना सज्जना भेटवी राघवासी ||२१||

स्थैर्य तो वासना से छूटकर ही आएगा
स्त्री और द्रव्य की कामनाओं से भला क्या होगा
बस घूम घूमकर यही आते जाते रहोगे
सज्जनों का संग ही तो राम से जोड़ेगा

मना सज्जना हीत माझे करावे |
रघूनायका दृढ चित्ती धरावे ||
महाराज तो स्वामि वायुसुताचा |
जना उद्धरी नाथ लोकत्रयाचा ||२२||

मेरा हित तो मेरा मन ही कर सकता हैं
वह राम को नित्यरूप से धारण कर सकता हैं
राम हनुमान के स्वामी हैं
वो तीनों लोको का उद्धार करते हैं

न बोले मना राघवेवीण काही |
मनी वाउगे बोलता सौख्य नाही ||
घडीने घडी काळ आयुष्य नेतो |
देहांती तुला कोण सोडू पहातो ||२३||

मेरे मन तू राम को छोड़ और का चिंतन न कर
उटपटांग बातों से क्या हासिल होगा
पल पल जीवन की घड़ियाँ ख़त्म हो रही हैं
अंत में किसके हाथो बच पाएगा सोच ले

रघूनायकावीण वाया शिणावे |
जनासारिखे व्यर्थ का वोसणावे ||
सदा सर्वदा नाम वाचे वसो दे |
अहंता मनी पापिणी ते नसो दे ||२४||

राम को छोड़कर व्यर्थ श्रम ही होगा
इधर उधर की बातों से क्या मिलेगा
जिव्हा पर राम का नाम रहे
मन में अहंकार का लेश न हो

मना वीट मानू नको बोलण्याचा |
पुढे मागुता राम जोडेल कैचा ||
सुखाची घडी लोटता सूख आहे |
पुढे सर्व जाईल काही न राहे ||२५||

राम का सिमरन तो करना ही होगा
नहीं तो राम से जुड़ कैसे पाएंगे
इस पल में तो गुदगुदी हो रही हैं
अंतिम साँस का भी तो सोचना हैं

देहेरक्षणाकारणे यत्न केला |
परी शेवटी काळ घेऊन गेला |
करी रे मना भक्ति या राघवाची |
पुढे अंतरी सोडि चिंता भवाची ||२६||

हमें शरीर से तो भारी लगाव हैं
लेकिन क्या वह काल का ग्रास नहीं हैं
मेरे मन तेरी भक्ति तो राम में ही हो
यही तुझे सभी जंजालों से सवारेगी

भवाच्या भये काय भीतोस लंडी |
धरी रे मना धीर धाकासि सांडी ||
रघूनायकासारिखा स्वामि शीरी |
नुपेक्षी कदा कोपल्या दंडधारी ||२७||

शरीर की आसक्ति भयभीत कर रही हैं
धीरज रखे और दबाव से ऊपर उठे
राम के समान स्वामी रखवाला हैं
जब यम का प्रकोप होगा राम रक्षा करेंगे

दिनानाथ हा राम कोदंडधारी |
पुढे देखता काळ पोटी थरारी ||
मना वाक्य नेमस्त हे सत्य मानी |
नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी ||२८||

धनुर्धारी राम तो गरीब निवाज हैं
उसके समक्ष तो काल भयभीत होता हैं
इस सारभूत वाक्य को ही सत्य जाने
अपने भक्तों की उपेक्षा राम कभी नहीं करते हैं

पदी राघवाचे सदा ब्रीद गाजे |
बळे भक्तरीपूशिरी कांबि वाजे ||
पुरी वाहिली सर्व जेणें विमानी |
नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी ||२९||

राम चरण का तो यह ब्रीद हैं
रामभक्तों के शत्रु टिक नहीं सकते
राम तो पूरी अयोध्या को वैकुंठ ले गए
अपने भक्तों की उपेक्षा राम कभी नहीं करते हैं

समर्थाचिया सेवका वक्र पाहे |
असा सर्व भूमंडळी कोण आहे ||
जयाची लिला वर्णिती लोक तीन्ही |
नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी ||३०||

रामभक्त को टेढ़ी निगाह से देखे
ऐसा इस दुनिया मैं कौन हैं
तीनो लोक तो रामलीला का ही गान करते हैं
अपने भक्तों की उपेक्षा राम कभी नहीं करते हैं